Saturday, November 18, 2017

Brave Hindu Goddess Mother Padmini

नयन मूँदकर चुप न रहो,
गत–व्याधि, समाधि लगे न कहीं।
सती - कहानी कहने की,
अन्तर से चाह भगे न कहीं॥
आकुल कुल प्रश्नों को सुनकर
मुकुलित नयनों को खोला।
वीर – करुण – रस - सिंचित स्वर से
सती – तीर्थ - यात्री बोला॥
क्या न पद्मिनी – जौहर व्याख्यान सुना प्राचीनों से?
क्या न पढ़ा इतिहास सती का
विद्या – निरत नवीनों से?
यदि न सुना तो सुनो कहानी
सती – पद्मिनी – रानी की।
पर झुक झुककर करो वन्दना,
पहले पहल भवानी की।
 *जौहर प्रस्तुति श्री श्यामनारायण पांडेय*


"रावल रतनसिंह व रानी पद्मिनी" की अमरगाथा

१३०२ ई.

* रावल रतनसिंह - ये रावल समरसिंह के पुत्र थे

* रानी पद्मिनी/रानी पद्मावती - १५४० ई. में लिखे गए पद्मावत ग्रन्थ के अनुसार ये सिंहल द्वीप के राजा गंधर्व सेन व रानी चम्पावती की पुत्री थीं, जिनका विवाह मेवाड़ के रावल रतनसिंह से हुआ

(रानी पद्मिनी के सही इतिहास को कुछ कवि लोगों ने तोड़-मरोड़कर कई खयाली किस्से लिखकर राजपूताना की तवारीख को खराब किया | इनमें से सबसे गलत किस्सा अलाउद्दीन का रानी के प्रतिबिम्ब को देखना है | पं. गौरीशंकर ओझा, कविराज श्यामलदास जैसे इतिहासकार भी इन खयाली किस्सों को गलत बताते हैं)

सही हाल कुछ इस तरह है -

* रानी पद्मिनी के पीहर का एक मुलाज़िम चित्तौड़ आया

ये बहुत बड़ा जादूगर था | इसकी कला से रावल रतनसिंह बड़े खुश हुए, पर एक दिन रावल रतनसिंह इससे नाराज़ हुए और इसे अपनी सेवा से ख़ारिज किया |

ये मुलाज़िम दिल्ली में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में गया और वहां अपनी जादूगरी दिखाकर सुल्तान को खुश किया | इस जादूगर ने एक दिन रावल रतनसिंह से बदला लेने के लिए दरबार में सुल्तान के सामने रानी पद्मिनी के रुप की तारीफ की |

* सुल्तान अलाउद्दीन ने रावल रतनसिंह को खत लिखकर रानी पद्मिनी को दिल्ली भेजने की बात कही | इस बात से आग-बबूला होकर रावल रतनसिंह ने एक खत कुछ इस तरह लिखा, कि सुल्तान को अगले ही दिन अपनी बड़ी फौज के साथ चित्तौड़ के लिए कूच करना पड़ा |

अलाउद्दीन के चित्तौड़ दुर्ग में आने की सही वजह कुछ इस तरह है -

* जब अलाउद्दीन बादशाही फौज के साथ चित्तौड़ के करीब आया, तो रावल रतनसिंह की फौजी टुकड़ियों ने महलों से बाहर निकलकर कई छोटी-बड़ी लड़ाईयाँ लड़ी

आखिरकार थक-हारकर अलाउद्दीन ने रावल रतनसिंह को खत लिखा कि "हमें हमारे कुछ आदमियों समेत किले में आने देवें, जिससे हमारी बात रह जावे, फिर हम चले जायेंगे"

रावत रतनसिंह ने ये प्रस्ताव स्वीकार कर अलाउद्दीन को १००-२०० आदमियों समेत दुर्ग में आने दिया

अलाउद्दीन ने अपनी नाराज़गी छिपाकर रावल रतनसिंह से दोस्ताना बर्ताव किया

जब रुखसत का समय हुआ, तो रावल रतनसिंह सुल्तान अलाउद्दीन को दुर्ग से बाहर पहुंचाने गए

इस समय अलाउद्दीन रावल रतनसिंह का हाथ पकड़कर दोस्ती की बातें करता हुआ दुर्ग से बाहर चलने लगा और मौका देखकर अपनी छुपी हुई फौज को बाहर निकालकर रावल का अपहरण कर अपने डेरों में ले गया

१३०३ ई.

* किले वालों ने अलाउद्दीन के डेरों पर जाकर कई बार बातचीत कर रावल रतनसिंह को छुड़ाने की कोशिश की, पर हर बार अलाउद्दीन ने रानी पद्मिनी के बदले रावल को छोड़ने की बात कही

* इतिहास में कुछ एेसे योद्धा भी हुए, जिनके नाम हमेशा साथ-साथ ही लिए जाते हैं, जैसे :- जयमल-पत्ता, जैता-कूम्पा, सातल-सोम

इसी तरह रानी पद्मिनी के समय गोरा-बादल नाम के योद्धा थे

* गोरा-बादल ने चित्तौड़ के सभी सर्दारों से सलाह-मशवरा किया कि किस तरह रावल रतनसिंह को छुड़ाया जावे

आखिरकार गोरा-बादल ने एक योजना बनाई

* अलाउद्दीन को एक खत लिखा गया कि, रानी पद्मिनी एक बार रावल रतनसिंह से मिलना चाहती हैं, इसलिए वह अपनी सैकड़ों दासियों के साथ आयेंगी

अलाउद्दीन इस प्रस्ताव से बड़ा खुश हुआ

* कुल ८०० डोलियाँ तैयार की गईं और इनमें से हर एक के लिए १६-१६ राजपूत कहारों के भेष में मुकर्रर किए

(बड़ी डोलियों के लिए ४ की बजाय १६ कहारों की जरुरत पड़ती थी)

इस तरह हजारों राजपूतों ने डोलियों में हथियार वगैरह भरकर अलाउद्दीन के डेरों की तरफ प्रस्थान किया, गोरा-बादल भी इनके साथ हो लिए

(कवि लोग खयाली बातें लिखते हैं कि इन डोलियों में सच में दासियाँ और रानी पद्मिनी थीं, तो कुछ कवि लोगों के मुताबिक रानी पद्मिनी की जगह उनकी कोई सहेली थी..... हालांकि ये बातें समझ से परे हैं)

* गोरा-बादल कई राजपूतों समेत सबसे पहले रावल रतनसिंह के पास पहुंचे

जनाना बन्दोबस्त देखकर शाही मुलाज़िम पीछे हट गए

* गोरा-बादल ने फौरन रावल रतनसिंह को घोड़े पर बिठाकर दुर्ग के लिए रवाना किया

* अलाउद्दीन ने हमले का अादेश दिया

सुल्तान के हजारों लोग कत्ल हुए

गोरा-बादल भी कईं राजपूतों के साथ वीरगति को प्राप्त हुए

फरवरी, 1303 ई.

* अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी फौज को तन्दुरुस्त कर चित्तौड़ के किले पर हमला किया

इस समय अमीर खुसरो भी अलाउद्दीन के साथ था

* रानी पद्मिनी के नेतृत्व में चित्तौड़ के इतिहास का पहला जौहर हुआ | अपने सतीत्व की रक्षा के लिए १६०० क्षत्राणियों ने जौहर किया |

१८ अगस्त, १३०३ ई.

* ६ महीने व ७ दिन की लड़ाई के बाद रावल रतनसिंह वीरगति को प्राप्त हुए और अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ दुर्ग फतह कर कत्लेआम का हुक्म दिया, जिससे मेवाड़ के हजारों नागरिकों को अपने प्राण गंवाने पड़े

* सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ दुर्ग अपने बेटे खिज्र खां को सौंप दिया व चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद रखा

* रावल रतनसिंह ने पहले ही अपने भाई-बेटों को ये कहकर दुर्ग से बाहर निकाल दिया था कि यदि हम लोग मारे जावें, तो आप सब फिर से किले पर अधिकार कर लें


जौहर, केसरिया व शाका का अर्थ :-

* जौहर :- जब कोई दुर्ग शत्रु सेना द्वारा घेर लिया जाता व पराजय प्रतीत होती तो शत्रुओं से अपने शील व गौरव को बचाने के लिए राजपूतानियों द्वारा अग्नि या जल में प्रवेश कर अपने प्राणों का बलिदान दिया जाता था।

* केसरिया :- जौहर होने के पश्चात राजपूत पुरुष योद्धा केसरिया धारण करते। इसका अर्थ था कि युद्धभूमि में विजय हो या वीरगति, परंतु पराजित होकर लौटना नहीं। अर्थात केसरिया तभी किया जाता, जब विजय की संभावना न के बराबर हो। केसरिया की स्थिति में राजपूतों द्वारा शत्रु सेना का भारी विनाश किया जाता था व इनका उद्देश्य अपने रक्त की अंतिम बूंद तक लड़ना होता था।

(पहले जौहर, फिर केसरिया किया जाता था)

शाका :- जौहर व केसरिया को सम्मिलित रूप से शाका कहा जाता है।



दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई क़ुरबानी
जिसके कारन मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी

 रावल रत्न सिंह को छल से कैद किया खिलजी ने
काल गई मित्रों से मिलकर दाग किया खिलजी ने
खिलजी का चित्तोड़ दुर्ग में एक संदेशा आया
जिसको सुनकर शक्ति शौर्य पर फिर अँधियारा छाया

 दस दिन के भीतर न पद्मिनी का डोला यदि आया
यदि ना रूप की रानी को तुमने दिल्ली पहुँचाया
तो फिर राणा रत्न सिंह का शीश कटा पाओगे
शाही शर्त ना मानी तो पीछे पछताओगे

 दारुन संवाद लहर सा दौड़ गया रण भर में
यह बिजली की तरक छितर से फैल गया अम्बर में
महारानी हिल गयीं शक्ति का सिंघासन डोला था
था सतीत्व मजबूर जुल्म विजयी स्वर में बोला था

 रुष्ट हुए बैठे थे सेनापति गोरा रणधीर
जिनसे रण में भय कहती थी खिलजी की शमशीर
अन्य अनेको मेवाड़ी योद्धा रण छोड़ गए थे
रत्न सिंह के संध नीद से नाता तोड़ गए थे

 पर रानी ने प्रथम वीर गोरा को खोज निकाला
वन वन भटक रहा था मन में तिरस्कार की ज्वाला
गोरा से पद्मिनी ने खिलजी का पैगाम सुनाया
मगर वीरता का अपमानित ज्वार नही मिट पाया

 बोला मैं तो बोहोत तुक्ष हू राजनीती क्या जानू
निर्वासित हूँ राज मुकुट की हठ कैसे पहचानू
बोली पद्मिनी समय नही है वीर क्रोध करने का
अगर धरा की आन मिट गयी घाव नही भरने का

 दिल्ली गयी पद्मिनी तो पीछे पछताओगे
जीतेजी राजपूती कुल को दाग लगा जाओगे
राणा ने को कहा किया वो माफ़ करो सेनानी

 यह कह कर गोरा के क़दमों पर झुकी पद्मिनी रानी
यह क्या करती हो गोरा पीछे हट बोला
और राजपूती गरिमा का फिर धधक उठा था शोला
महारानी हो तुम सिसोदिया कुल की जगदम्बा हो
प्राण प्रतिष्ठा एक लिंग की ज्योति अग्निगंधा हो

 जब तक गोरा के कंधे पर दुर्जय शीश रहेगा
महाकाल से भी राणा का मस्तक नहीँ कटेगा
तुम निश्चिन्त रहो महलो में देखो समर भवानी
और खिलजी देखेगा केसरिया तलवारो का पानी

 राणा के शकुशल आने तक गोरा नहीँ मरेगा
एक पहर तक सर काटने पर धड़ युद्ध करेगा
एक लिंग की शपथ महाराणा वापस आएंगे
महा प्रलय के घोर प्रबन्जन भी न रोक पाएंगे

 शब्द शब्द मेवाड़ी सेनापति का था तूफानी
शंकर के डमरू में जैसे जाएगी वीर भवानी
जिसके कारन मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी
दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई क़ुरबानी


खिलजी मचला था पानी में आग लगा देने को
पर पानी प्यास बैठा था ज्वाला पी लेने को
गोरा का आदेश हुआ सज गए सात सौ डोले
और बाँकुरे बदल से गोरा सेनापति बोले

 खबर भेज दो खिलजी पर पद्मिनी स्वयं आती है
अन्य सात सौ सखियाँ भी वो साथ लिए आती है

स्वयं पद्मिनी ने बादल का कुमकुम तिलक किया था
दिल पर पत्थर रख कर भीगी आँखों से विदा किया था

 और सात सौ सैनिक जो यम से भी भीड़ सकते थे
हर सैनिक सेनापति था लाखो से लड़ सकते थे
एक एक कर बैठ गए सज गयी डोलियां पल में
मर मिटने की होड़ लग गयी थी मेवाड़ी दल में

 हर डोली में एक वीर था चार उठाने वाले
पांचो ही शंकर के गण की तरह समर मतवाले

बज कूच शंख सैनिकों ने जयकार लगाई
हर हर महादेव की ध्वनि से दशो दिशा लहराई

 गोरा बादल के अंतस में जगी जोत की रेखा
मातृ भूमि चित्तोड़ दुर्ग को फिर जी भरकर देखा
कर प्रणाम चढ़े घोड़ो पर सुभग अभिमानी
देश भक्ति की निकल पड़े लिखने वो अमर कहानी

 जिसके कारन मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी
दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई क़ुरबानी

गोरा की चातुरी चली राणा के बंधन काटे
छांट छांट कर शाही पहरेदारो के सर काटे
लिपट गए गोरा से राणा गलती पर पछताए
सेना पति की नमक खलाली देख नयन भर आये

 पर खिलजी का सेनापति पहले से ही शंकित था
वह मेवाड़ी चट्टानी वीरो से आतंकित था
जब उसने लिया समझ पद्मिनी नहीँ आयी है
मेवाड़ी सेना खिलजी की मौत साथ लायी है
पहले से तैयार सैन्य दल को उसने ललकारा
निकल पड़ा तिधि दल का बजने लगा नगाड़ा
दृष्टि फिरि गोरा की राणा को समझाया

 रण मतवाले को रोका जबरन चित्तोड़ पठाया

राणा चले तभी शाही सेना लहरा कर आयी
खिलजी की लाखो नंगी तलवारें पड़ी दिखाई
खिलजी ललकारा दुश्मन को भाग न जाने देना
रत्न सिंह का शीश काट कर ही वीरों दम लेना

 टूट पदों मेवाड़ी शेरों बादल सिंह ललकारा
हर हर महादेव का गरजा नभ भेदी जयकारा
निकल डोलियों से मेवाड़ी बिजली लगी चमकने
काली का खप्पर भरने तलवारें लगी खटकने

 राणा के पथ पर शाही सेना तनिक बढ़ा था
पर उसपर तो गोरा हिमगिरि सा अड़ा खड़ा था
कहा ज़फर से एक कदम भी आगे बढ़ न सकोगे
यदि आदेश न माना तो कुत्ते की मौत मरोगे
रत्न सिंह तो दूर ना उनकी छाया तुहे मिलेगी
दिल्ली की भीषण सेना की होली अभी जलेगी



यह कह के महाकाल बन गोरा रण में हुंकारा
लगा काटने शीश बही समर में रक्त की धारा
खिलजी की असंख्य सेना से गोरा घिरे हुए थे
लेकिन मानो वे रण में मृत्युंजय बने हुए थे
पुण्य प्रकाशित होता है जैसे अग्रित पापों से
फूल खिला रहता असंख्य काटों के संतापों से

 वो मेवाड़ी शेर अकेला लाखों से लड़ता था
बढ़ा जिस तरफ वीर उधर ही विजय मंत्र बढ़ता था
इस भीषण रण से दहली थी दिल्ली की दीवारें
गोरा से टकरा कर टूटी खिलजी की तलवारें

मगर क़यामत देख अंत में छल से काम लिया था
गोरा की जंघा पर अरि ने छिप कर वार किया था

 वहीँ गिरे वीर वर गोरा जफ़र सामने आया
शीश उतार दिया धोखा देकर मन में हर्षाया
मगर वाह रे मेवाड़ी गोरा का धड़ भी दौड़ा
किया जफ़र पर वार की जैसे सर पर गिरा हतोड़ा
एक बार में ही शाही सेना पति चीर दिया था
जफ़र मोहम्मद को केवल धड़ ने निर्जीव किया था

 ज्यों ही जफ़र कटा शाही सेना का साहस लरज़ा
काका का धड़ लख बादल सिंह महारुद्र सा गरजा
अरे कायरो नीच बाँगड़ों छल में रण करते हो
किस बुते पर जवान मर्द बनने का दम भरते हो
यह कह कर बादल उस छन बिजली बन करके टुटा था
मनो धरती पर अम्बर से अग्नि शिरा छुटा था

 ज्वाला मुखी फहत हो जैसे दरिया हो तूफानी
सदियों दोहराएंगी बादल की रण रंग कहानी
अरि का भाला लगा पेट में आंते निकल पड़ी थीं
जख्मी बादल पर लाखो तलवारें खिंची खड़ी थी
कसकर बाँध लिया आँतों को केशरिया पगड़ी से
रण चक डिगा न वो प्रलयंकर सम्मुख मृत्यु खड़ी से

 अब बादल तूफ़ान बन गया शक्ति बनी फौलादी
मानो खप्पर लेकर रण में लड़ती हो आजादी

उधर वीरवर गोरा का धड़ आर्दाल काट रहा था
और इधर बादल लाशों से भूदल पात रहा था
आगे पीछे दाएं बाएं जैम कर लड़ी लड़ाई
उस दिन समर भूमि में लाखों बादल पड़े दिखाई

 मगर हुआ परिणाम वही की जो होना था
उनको तो कण कण अरियों के सोन तामे धोना था
अपने सीमा में बादल शकुशल पहुच गए थे
गारो बादल तिल तिल कर रण में खेत गए थे
एक एक कर मिटे सभी मेवाड़ी वीर सिपाही
रत्न सिंह पर लेकिन रंचक आँच न आने पायी

 गोरा बादल के शव पर भारत माता रोई थी
उसने अपनी दो प्यारी ज्वलंत मनियां खोयी थी
धन्य धरा मेवाड़ धन्य गोरा बादल अभिमानी
जिनके बल से रहा पद्मिनी का सतीत्व अभिमानी
जिसके कारन मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी
दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई क़ुरबानी





हमारे शास्त्रों के अनुसार रूप सौन्दर्य,विचार, व्यवहार आदि गुणों के आधार पर स्त्रियों को चार श्रेणियों में बांटा गया है- पद्मिनी,चित्रणी,हस्तिनी व संखिणी, पद्मिनी चरित्र चौपाई नामक पुस्तक में लेखक ने इन चारों श्रेणियों की महिलाओं के अलग अलग गुणों आदि परइस तरह प्रकाश डाला है-

पद्मिनी पद्म गन्धा च पुष्प गन्धा च चित्रणी|
हस्तिनी मच्छ गन्धा च दुर्गन्धा भावेत्संखणी||

पद्मिनी स्वामिभक्त च पुत्रभक्त च चित्रणी|
हस्तिनी मातृभक्त च आत्मभक्त च संखिणी ||

पद्मिनी करलकेशा च लम्बकेशा च चित्रणी |
हस्तिनी उर्द्धकेशा च लठरकेशा च संखिणी ||

पद्मिनी चन्द्रवदना च सूर्यवदना च चित्रणी |
हस्तिनी पद्मवदना च शुकरवदना च संखिणी ||

पद्मिनी हंसवाणी च कोकिलावाणी च चित्रणी |
हस्तिनी काकवाणी च गर्दभवाणी च संखिणी ||

पद्मिनी पावाहारा च द्विपावाहारा च चित्रणी |
त्रिपदा हारा हस्तिनी ज्ञेया परं हारा च संखिणी ||

चतु वर्षे प्रसूति पद्मन्या त्रय वर्षाश्च चित्रणी |
द्वि वर्षा हस्तिनी प्रसूतं प्रति वर्ष च संखिणी ||

पद्मिनी श्वेत श्रृंगारा, रक्त श्रृंगारा चित्रणी |
हस्तिनी नील श्रृंगारा, कृष्ण श्रृंगारा च संखिणी ||

पद्मिनी पान राचन्ति, वित्त राचन्ति चित्रणी |
हस्तिनी दान राचन्ति, कलह राचन्ति संखिणी ||

पद्मिनी प्रहन निंद्रा च, द्वि प्रहर निंद्रा च चित्रणी |
हस्तिनी प्रहर निंद्रा च, अघोर निंद्रा च संखिणी ||

चक्रस्थन्यो च पद्मिन्या, समस्थनी च चित्रणी |
उद्धस्थनी च हस्तिन्या दीघस्थानी संखिणी ||

पद्मिनी हारदंता च, समदंता च चित्रणी |
हस्तिनी दिर्घदंता च, वक्रदंता च संखिणी ||

पद्मिनी मुख सौरभ्यं, उर सौरभ्यं चित्रणी |
हस्तिनी कटि सौरभ्यं, नास्ति गंधा च संखिणी ||

पद्मिनी पान राचन्ति, फल राचन्ति चित्रणी |
हस्तिनी मिष्ट राचन्ति, अन्न राचन्ति संखिणी ||

पद्मिनी प्रेम वांछन्ति, मान वांछन्ति चित्रणी |
हस्तिनी दान वांछन्ति, कलह वांछन्ति संखिणी ||

महापुण्येन पद्मिन्या, मध्यम पुण्येन चित्रणी |
हस्तिनी च क्रियालोपे, अघोर पापेन संखिणी ||

पद्मिनी सिंघलद्वीपे च, दक्षिण देशे च चित्रणी |
हस्तिनी मध्यदेशे च, मरुधराया च संखिणी ||


ancient city of Padmavati of Bhavabhuti
Note pyriform lute/Veena and haarp.




कथित सेकुलर इतिहासकार, पत्रकार भंसाली के पक्ष में रानी पद्मिनी के इतिहास को काल्पनिक बताने के लिए भले कितनेही चिल्लाये पर पर यह नग्नसत्य है कि अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ कर आक्रमण किया था|

चित्तौड़ लेने की उसकी मंशा बेशक आर्थिक, राजनैतिक, कुटनीतिक थी| पर राघव चेतन द्वारा भड़काये जाने पर खिलजी की राजनैतिक महत्वाकांक्षा के साथ पाशविक पिपासा का पुट भी लग गया था, ऐसा इतिहास पढने पर आभास होता है| खिजली की चित्तौड़ आक्रमण के लिए सजी धजी सेना के साथ एक ऐसा व्यक्ति भी था, जो इस घटना का प्रत्यक्षदर्शी था| इस व्यक्ति ने अपनी लेखनी के माध्यम से इतिहासकारों को कतिपय ऐतिहासिक सूत्र उपलब्ध कराएँ है, वो बात अलग है कि अलाउद्दीन खिलजी के डर से वह सब कुछ सीधा सीधा व सचनहीं लिख पाया और कथित सेकुलर गैंग उसकी इसी कमी को दरकिनार कर, उसके द्वारा इशारा किये तथ्यों को नजरअंदाज कर, रानी की कहानी को काल्पनिक प्रचारित करने का कुकृत्य कर रहे है|

जी हाँ ! हम बात कर रहे है खिलजी की सेना के साथ रहे प्रसिद्ध कवि व इतिहासकार अमीर खुसरो की| डा. गोपीनाथ शर्मा अपनी पुस्तक “राजस्थान का इतिहास” में इलियट, हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया, भाग-3, पृ-76-77 का हवाला देते हुए लिखते है- “उसकी विद्यमानता में हमें आक्रमण की घटना के कतिपय सूत्र उपलब्ध होते है|

वह लिखता है कि सुलतान ने गंभीरी और बेडच नदी के मध्य अपने शिविर की स्थापना की| इसके पश्चात् सेनाके दाएं और बाएं पार्श्व से किले को दोनों ओर से घेर लिया| ऐसा करने से तलहटी की बस्ती भी घिर गई| स्वयं सुलतान ने अपना ध्वज चितौड़ नामकएक छोटी पहाड़ी पर गाड़ दिया और वहीं वह अपना दरबार लगता और घेरे के सम्बन्ध में दैनिक निर्देश देता था|

”डा. शर्मा अपनी शोध के बाद आगे लिखते है- “घेरा लम्बी अवधि तक चला| राजपूतों ने किले के फाटक बंद कर लिए और परकोटों से मोर्चा बनाकर शत्रु-दल का मुकाबला करते रहे| सुलतान की सेना ने मजनिकों से किले की चट्टानों को तोड़ने का आठ माह तक प्रयास किया| जब चारों ओर से सर्वनाश के चिन्ह दिखाई दे रहे थे, शत्रुओं से बचने का कोई उपाय नहीं दिखाई दे रहा था और किसी कीमत पर दुर्ग को बचाया नहीं जा सकता था|”हार की स्थिति में स्त्रियों के साथ भीषण व्याभिचार होना तय था| तब स्त्रियों व बच्चों को जौहर की धधकती अग्नि में अर्पण कर दिया गया| इस कार्य के बाद किले के फाटक खोल दिए गए और बचे हुए वीर शत्रु की सेना पर टूट पड़े और वीर गति को प्राप्त हुए|

डा. गोपीनाथ शर्मा की शोध पुस्तक में रानी पद्मिनी व खिलजी के आक्रमण पर जुटाए ऐतिहासिक तथ्य इरफ़ान हबीब जैसे इतिहासकारों के मुंह पर तमाचा है|

पर इन बेशर्मों का एक ध्येय है किसी तरह भारतीय संस्कृति व स्वाभिमान पर चोट के लिए इतिहास का बिगाड़ा करो| रानी पद्मावती पर भंसाली का फिल्म निर्माण भी धन कमाने के साथ इसी वामपंथी एजेन्डे को आगे बढ़ाना है| यही कारण है कि देश का तथाकथित प्रगतिशील लेखक समुदाय,पत्रकार इस मुद्दे पर भंसाली के साथ खड़े है|


BRAVE HINDU WARRIORS
RAJPUTANA
JAY EKLINGNATH JI

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